कुछ बेपरवाह पंक्तियों का संग्रह

मुबारक़ हो तुम्हें मज़हब की ये चारदीवारी,
मेरा खुदा मुझे मस्ज़िद में बैठने नहीं देता।
काफ़िर है अनजान, ये सारे जहाँ में है मशहूर,
किस पत्थर पे करूँ सिजदा, ये तो बता।

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सुबह की साँस में है रात सी बेहोशी
या मेरे पहलू में सिमटी तेरे इश्क़ की इबारत ।
ज़िस्म से रूह तक है अनजान ख़ामोशी
या मेरे दिल में धड़कती तेरे नाम की इबादत ।

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हँसी के मुखौटे को सच ना समझ अनजान,
आंसुओं की कब्र पे ये उगाये जाते हैं ।
महफ़िलों के सन्नाटे में दिल की आवाज़ तो सुन,
भूलने को ही बेमुरव्वत यार बनाये जाते हैं ।

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हर बुलबुले को छूकर देखा,
उनकी रंगीनियत एक तमाशा ही थी,
हर दिलफ़रोश को खुदा समझा,
उनकी रूमानियत एक ज़नाज़ा ही थी !

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वक़्त के तसव्वुर में बहे जा रहा हूँ,
कोई हाथ थाम ले, कहे जा रहा हूँ,
जुनूं के महल में दिलों के ख्वाब फीके हैं अनजान,
इमारतों की ईटें गिने जा रहा हूँ ।

– चक्रेश मिश्र “अनजान”

One thought on “कुछ बेपरवाह पंक्तियों का संग्रह

  1. NICE COLLECTION…GR8 THOUGHTS..LIKED IT..A SMALL ONE 4M MY SIDE..
    “TUJHE TAALASHNE KI AAS MEIN KHUD KO YU TARASHAA,
    KI TUJHSE MILKAR,
    TERI BERUKHI BHI
    EK SUKOON DE GAYI..”
    🙂

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