सपनो का नीला खून

ये मेरा जीवन क्या है।
कुछ घटनाएँ, चंद बिछड़े लोग।
कुछ यादें जो तेरे मेरे अंदर,
जिन्दा हैं न चाहकर भी।
कुछ लोग हैं जिनकी यादें नहीं छूटेंगी।
कुछ यादें जिनके लोग अपने नहीं रहते।

लोग कहते हैं सपने देखो।
लोग कहते हैं जिन्दा रहो।
वो ये नहीं बताते कि,
जिंदगी एक सपना नहीं है।
बेतरतीब घटनाओं का,
बेहिसाब लोगों का,
एक ढेर है,
जिसमें से कूड़ा बीनने वाले की तरह,
लाचार, निराश, दुत्कारे हुए लोग,
कुछ सपने चुन लेते हैं।
और फिर उन्ही के सहारे,
रातों की सर्दी और दिनों की बेशर्मी,
दूर करने की ताउम्र कोशिश करते हैं।

अब दो विकल्प हैं मेरे पास,
या तो आँखे बंद करके
जिंदगी को एक सपने की तरह जीते रहो।
अनजान, वास्तविकता से दूर।
सोते हुए, मरे हुए के तरह।
या आँखे खोलकर देखो
और समझो कि ये जिंदगी
जीने का कोई अर्थ नहीं है।

जिस तरफ देखो एक रेगिस्तान है,
जिसमे हर तरफ पानी है।
मन में प्यास जैसा कुछ है,
लेकिन ध्यान से देखो तो
ये नीला खून है, सपनो का,
जिसे पीने की शायद मुझमे ताकत नहीं।
शायद रेगिस्तान को मतलब भी नहीं।
क्योंकि मेरे से ज्यादा है
वो मरा हुआ।

– चक्रेश मिश्र “अनजान”

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