तुम एक कविता हो

मेरे लिए तुम
एक कविता हो
जिसको गुनगुनाने की भाषा
नहीं जानता मैं ।

एक बच्चे की तरह
कुछ कहना है मुझे
पर शब्दों को
नहीं जानता मैं ।

दुनिया के तरीकों में
ये हँसी, चंद आँसू
या मृत्यु की शान्ति
यही जानता मैं ।

तुम पास हो या दूर
तुम्हें हर पल चाहने के सिवा
कुछ कहाँ जानता मैं
कहाँ जानता मैं ।

आगे बढूँ या खड़ा रहूँ
नहीं जानता मैं ।

– चक्रेश मिश्र “अनजान”

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