अपने अपने इन्द्रधनुष

क्यों दर्द भरा मैं गीत लिखूं,
या होठों से मुस्कान कहूँ,
तुम समझो भी या ना समझो,
हैं अपने अपने इन्द्रधनुष ।

क्यों रुककर मैं संताप करूँ,
या अज्ञात क्षितिज की ओर बढूँ,
स्वर्ग नरक का भेद कहाँ,
हैं अपने अपने इन्द्रधनुष ।

नश्वर जीवन के पाठ पढूं,
या चलते कदमों का अंत करूँ,
राही राहों का अंत नहीं,
हैं अपने अपने इन्द्रधनुष ।

पल भर क्यों तेरे साथ रहूँ,
या तुझे अभी से भूल चलूँ,
जब मन में तेरे स्थान नहीं,
हैं तेरे अपने इन्द्रधनुष ।

मीलों के पत्थर याद रखूँ,
या झूठे लक्ष्यों का संधान करूँ,
अनजान जगत में अनजान खड़ा,
क्यों देखूं अपने इन्द्रधनुष ।

– चक्रेश मिश्र “अनजान”

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