मंज़िल तो तू ही है

तेरी बातों का बुरा मानना ही क्या ,
खुद की बातें ही अब ज़हर लगती हैं ,
तेरी राहों में हर कदम मिली बेवफ़ाई ,
तेरा इश्क़ भी अब खुदगर्ज़ी लगती है ,
जो चला मैं मन में ले कर वो खुदा ,
हर कंकड़ में अब मस्ज़िद ही दिखती है ,
छोड़ दे गैरों की फ़िकर ऐ नादान,
पल पल सुलगती ये ज़िन्दगी लगती है ।

मंज़िल तो तू ही है,
पर ज़िंदगी निकल रही है,
तेरे पास आने में ।
हर मोड़ दर्द मिला,
फिर भी इक जुनूँ है,
तुझे ढूंढ पाने में ।
अब सांस नहीं आती,
फ़ना हर वक़्त अनजान,
तुझे खुदा बनाने में ।

– चक्रेश मिश्र “अनजान”

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