गीली सी सड़क पे

Written on the issue of death penalty for minor accused of delhi rape. To be sung on the tune of “Husna by Piyush Mishra

फुटपाथ के ऊपर
नीले पोलिथिन को ओढे
लेटा तू टुकटुक ताके
तेरे आंसू आँखों से झांके
बगल में इक
सूखी हड्डी को लेकर
वो पिल्ला भूख से कांपे |

गीली सी सड़क पे
तेरे इलाके का
वो मासूम सा चेहरा
अपने छोटे से कुत्ते को लेकर
उस शाम टहलने निकला
मुह फेरे था तू
नहीं पूछा किसी ने
जब ये किस्सा हवा में था तैरा |

उन दो पलों में
वो छोटा सा पिल्ला
उस शाही कुत्ते पे झपटा
भूखी आंतो पे मारा उसी ने
जिसको मासूम तूने समझा
तू उठा गुस्से से
पिल्ले को बचाने
तू जोर लगाकर दौड़ा |

फूल सी लड़की
डर कर चिल्लाई
तेरे गंदे से चेहरे पे
हौले से मुस्कान आई
सब लोगों ने मारा
पुलिस ने सताया
वो रात सलाखों संग बिताई |

उस रात भयंकर
दरिंदों के पंजों से
तेरा बचपन ना बच पाया
तू जिन्दा था फिर भी
जीना था तुझको
पर तेरी रगों के खौले लहू में
छुप बैठा था इक दरिंदा |

मैं ना जानू ये गुस्सा था
सलाखों के अँधेरे पे
या उस मासूम चेहरे पे
तेरे अन्दर का दरिंदा
पाकर इक मौका
उस लड़की पे झपटा
जो लगती थी उसी मासूम की तरहा |

अब आज बैठा
काली रातों में
जंजीरों को सीने से लगाये
सोलह बरस के अपने
इस बदन से नफरत सुलगाये
सोचता होगा कि काश जीने का
एक मौका और मिल जाये |

वो बाहर सड़क पे
लोगो का एक झुण्ड
तेरी मौत की दुहाई लगाये
तू पापी है ये जानते हैं सब
जुलूस नारे लगाये
बस वो पिल्ला खड़ा है
नीली पोलिथिन मुह में दबाये |

चाहता हूँ मैं भी
तू फांसी चढ़ जाए
इन लोगों को एक रावण मिलेगा
जो इनके मन की
छुपी हुयी लंका जलाये
नहीं पूछेंगे ये कि कैसे रोज़
नए नए रावण धरती से उग आये |

जानता हूँ मैं कि कोई
फरक नहीं है तुझमे और इनमे
गीली सड़क के
वो खूंखार रावण
हम सबने मिलकर बनाये
तो कैसे रह जाता मैं
बिना तेरी कहानी सुनाये |

– चक्रेश मिश्र “अनजान”

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10 thoughts on “गीली सी सड़क पे

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