कहाँ है घर मेरा ?

क्या करूं, आदत है,
अक्सर ड्राइवर से गुफ्तगू करने की |
पर आज उसने वो कठिन सवाल पूछ लिया,
घबराता हूँ जिसका उत्तर
सोचने से, सुनने से, ढूँढने से ।

साहब आपका घर कहाँ है ?
सवाल अंतरात्मा तक चुभा,
तर्क वितर्क भावनाओं से घिरा,
बार बार खुद से पूछा,
कहाँ है घर मेरा ?

पहले सोचा उन दीवारों के बारे में,
उन इंसानों के बारे में
चारो तरफ पाता हूँ जिन्हें हर रोज़,
दोनों ही बड़े महंगे हैं,
पर प्यार नहीं मिलता वहां ।

उदास हुआ तो माँ का आँचल याद आया |
हाँ, वहां प्यार जगता है,
उनसे मिलके सुकून मिलता है,
लेकिन पिछले 12 साल से बाहर हूँ,
तो उस मकान में घर नहीं ढूंढ पाता ।

टूटे हुए दिल में ख्याल आया,
उसकी बाँहों की नरमी का,
उसकी साँसों की गरमी का,
वहां ख़ुशी भी है, सुकून भी,
और सबसे बढ़कर जूनून भी,

बस बोलने को ही था अपने उस घर का पता,
पर हिचक गया |
जब दुनिया के सामने
उसे सीने से नहीं लगा सकता,
तो उसके घर को अपना कैसे बता सकता ।

इसी कशमकश में
उस शाम की मंजिल आ गयी,
एक बार सामने कंक्रीट के रास्ते को देखा,
एक बार पीछे मुड़कर ड्राइवर को देखा,
सिर झुकाकर चल दिया सोचते हुए,

आखिर कहाँ है घर मेरा ?

– चक्रेश मिश्र “अनजान”

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14 thoughts on “कहाँ है घर मेरा ?

  1. Searching the path…….. why so many questions always come to mind…. beautifully depicted the state of mind and need for something which we can say ours.

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  2. sir nice poem…………….u r really a creatin=ve person,,,,keep it up.all the best world is urs:::::::::::::::::::: win it

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  3. house is made Home by emtions of loving ppl arnd you nt by bricks……..ghar ka pata batane ke liye kahi na kahi rukna padta hn sir life main…wapas lautke wahi aana padta hn….one way aage badhte rahey to kisi ke liye bhi ghar ka pata batana mushkil ho jata hn …..bina ruke ghar nahi milta…….wish u gud luck so that u get to knw jaldi ki kaha hn ghar tera….:-)

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  4. I’m going to prepare for IAS exams, while finding some article about its preparation, got this website and while looking on the detail found the topic (कहाँ है मेरा घर?). I shocked because on the same topic I wrote a poem related to my life in the may of march 2014. Have a look.

    कहाँ है मेरा घर?

    मुझे घर आना था,
    काम एक बहना था!
    चली ट्रेन से घर को,
    सैकरो मिलो दूर,
    छोड़कर हाई प्रोफाइल सर्किल को,
    बड़े-बड़े गाडियों के भीड़ से दूर,
    ट्रेन रूक चला मंजिल पर,
    मेरी मंजिल फिर भी बांकी थी,
    मै तो चली थी घर के सफ़र पर!
    एक और यात्रा शुरु हुआ,
    घर के लिए,
    इस बार जरिया ‘बस’ था,
    दिल में कस्मोकस था,
    एक सवाल जेहन में,
    बार-बार आया,
    कहाँ है मेरा घर?
    हाँ कहाँ है घर!
    ये सवाल नही जीवन है,
    जीती आई हूँ जिसे,
    मैं वर्षो से,
    पूछती आई हूँ सबसे,
    किसी ने जवाब नही दिया!
    तभी सवाल अभी भी बांकी है,
    कहाँ है मेरा घर?
    घर, जहाँ मैं जन्मी थी,
    घर, जो सब कहते है मेरा है,
    जिसे उसने छिना है,
    घर जो अभी रहती हूँ,
    घर, जंहा सबको छोड़ जाना है,
    हमेशा-हमेशा के लिए!
    -चंचल साक्षी

    I wish you all the best for your Exams.

    Regards,
    Chanchal

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