स्वर्ग का ढहता द्वार

वो उन्ही रास्तों पर फिर भटक रहा है,
ना कोई उल्लास है, टूटती श्वास है,
फिर भी न जाने क्यूँ एक विश्वास है,
पैर डगमगाते से लगते हैं,
मुखौटे चिढाते से लगते हैं,
समय के हृदय से लहू बह रहा है,
सामने स्वर्ग का द्वार ढह रहा है |

चारों तरफ मृत चमकती इमारतें हैं,
वास्तविकता छल रही है,
तेज़ आंधी चल रही है,
एक गिरता हुआ बिजली का खम्भा है,
हर कुरेदती आँख में एक अचम्भा है,
कुछ लोग अपने दरवाजों से बुला रहे हैं,
बाकी लड़खड़ाते पैरो पे बोली लगा रहे हैं |

वो लोगों की चीरती निगाहों से भागना चाहता है,
गहरी उम्मीद की नींद से जागना चाहता है,
लेकिन कल रात जो स्वप्न देखा था,
उस चित्र को फिर बनाना चाहता है,
फटी तस्वीर में जान डालना चाहता है,
वो रंग की तलाश में सड़क के हर छोर तक गया,
हाथ फैलाकर हर रंगरेज़ से मांगने कोई रंग नया |

लोग उसके स्वर्ण मुकुट को देखते हैं,
पीछे चलती अप्सराओं को घूरते हैं,
फिर उसके गले से लटकते फटे चित्र को देखकर,
अहंकारी समझ उसकी शाही फकीरी पे थूकते हैं,
वो फिर उन्ही भीगी आँखों से,
उन्ही बदहवास साँसों से,
और बचे खुचे रंग से, तस्वीर संवार रहा है |

क्या कहते हो आप,
जब तक आसमा की बिजली इसे जला न दे,
या इसकी दीवानगी इसे पागल बना न दे,
क्या ये तड़पता रहेगा ऐसे ही ?
चलो देखें क्या है आखिर उस गंदे फटे चित्र में,
पहली तरफ तुम सबके लिए खुशनुमा संसार है,
दूसरी तरफ उसके खुद के लिए सौंधा सा प्यार है |

-चक्रेश मिश्र ‘अनजान’

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