मन एक दोराहे पर

पहाड़ पर चढ़कर, कुछ देर थमकर,
मन एक दोराहे पर खड़ा होता है  |

एक तरफ हैं और ऊँची चोटियाँ, हसीं नजारों का वायदा,
बड़ा नशा भी है, कुछ और चलने का, कहीं भटकने का,
विश्वास कहो या कहो गुरूर, वहां, सबसे ऊपर पहुँचने का,
कुछ तुड़े-मुड़े पन्ने भी हैं कहीं किसी जेब के एक कोने में,
जिनपर अपने हाथ से लिखा था, यूँ ही मधुर सपना बुना था,
समाज की, राष्ट्र की, मानवता की सेवा का संकल्प सजा था,
इस राह में कठिनाइयाँ हैं, राक्षस हैं, मनुष्य हैं, देवता हैं
लोगों का प्यार है, जयजयकार है, मान लो कि सारा संसार है |

एक दूसरा रास्ता भी है, बाहें पसारे, चुपचाप सा
कोई पगडण्डी नहीं बनी है इस पर
टेड़ा मेडा, बेतरतीब, न कोई नियम,
न शब्द, न स्वर,
न तुक, न ताल,
कहीं जाता भी है या नहीं, मैं नहीं जानता, न जानना चाहता हूँ
बस बुलाता है, बिना किसी ख़ुशी का वायदा किये,
खुद से बात करने का,
अंतर्मन को समझने का मौका मिलेगा,
ऐसा लिखा है वहां |

किस तरफ जाऊं, पिछले दस साल से खड़ा हूँ, सोचते हुए,
क्या पहले रास्ते से दूसरा मिल पायेगा कभी चलते हुए?

खैर छोड़ो,
क्या फर्क पड़ता है,
कुछ दिनों में ना रास्ता रहेगा ना राही |

5 thoughts on “मन एक दोराहे पर

  1. O friend! thy art really awesome…in fact SIMPLY awesome…just as i m…
    listen the song ‘aye mere watan k logo’…..by Lata jee (preferably old form)..
    u ll surely get the solution regarding the conflict of your “”soul’ly”” and “”materialistic”” achievement……
    Good Wishingzzz””

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