रेत के महल

रेत के महल, सपनो के समंदर किनारे रोज़ बनाता हूँ,

कभी शाम को बालकनी में खड़े होकर,

कभी सुबह अलार्म बजने के बाद पंखे को देखकर,

कभी सड़क पर कोई खाने की दुकान ढूंढते हुए,

या कभी यूँ ही इधर उधर यहाँ वहां खुली आँखों से ।

 

ख्वाब जिनका कोई वजूद नहीं,

ख्वाब जिनके पूरा होने का कोई सुरूर नहीं,

साथ में कुछ टूटे हुए, कुछ भूले हुए,

कुछ जाने क्यूँ बेवफा मुझसे रूठे हुए,

कुछ वो ख्वाब भी जो हैं जिंदगी में मुझे थामे हुए।

 

वक्त निकलता जाता है, लोग हँसते रहते हैं,

कभी मुस्कराता हूँ, कभी झुंझलाता हूँ, समय बिताता हूँ,

कभी बंद कमरे में sad songs सुनकर,

कभी कहकहों की महफ़िल में झूठी मुस्कान दिखाकर,

क्या सचमुच कोई फर्क पड़ता है?

 

ख्वाब देखो या ख्वाब जैसी यह जिन्दगी जियो,

ना ये सच है ना ही वो,

फिर क्यूँ तुम मेरे ख्वाब देखने पर हँसते हो,

क्यूँ दिन रात पागल समझकर पत्थर मारते हो,

क्यूँ अपनी जिन्दगी को असली मानकर मुझे डराते हो ।

 

अपने ख्वाब में वो सब करता हूँ जो करना चाहता हूँ,

कभी महानता का ऊँचा हिमालय चढ़ता हूँ,

कभी प्यार की रूमानियत महसूस करता हूँ,

कभी तुम्हारी नकली दुनिया के रोते हुए चेहरों पर हँसता हूँ,

कभी उन्ही आंसुओ के दर्द से अपनी रूह भी भिगोता हूँ ।

 

भूल जाओ की तुम इन् खुली आँखों के सपनो को कभी समझ पाओगे

तुम अपनी असली दुनिया में जियो, मैं अपने झूठ में खुश हूँ,

बस एक गुजारिश है,

कभी सपनो में खोये हुए मुझे किसी अनजान राह पे जाते देखो,

तो रोकना मत, टोकना मत, झकझोरना मत ।

 

तुम्हारे छूने से ये संजीदा गुब्बारे फूट जाते हैं,

अरसों से संभाले रंग मुझे ही लूट जाते हैं ।

 

– चक्रेश मिश्र “अनजान”

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