चौथी मुलाकात

होश आया तब समां था कि हाथ में हाथ और नज़र के जल रहे थे दो दिये |
शायद अब नहीं मिलेंगे कभी, जान कर, कह कर, मुस्करा कर, वो तेज़ी से चल दिये |
ऐसा नहीं कि जानता हूँ बरसों से, ना ही सपनो में रोज़ का कोई आना-जाना है |
चौथी मुलाकात थी केवल, फिर भी खड़ा रहा, पलटकर देखे, इसका आसरा लिये |
कोई स्प्रिंग सा खिंचा, कोई रोकने को हुआ, पर जज्बात जाने क्यूँ जब्त किये |
शरीफों की बस्ती थी मियाँ,  क्या करते, हम भी नज़र घुमाके अपनी राह हो लिये |

11 thoughts on “चौथी मुलाकात

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