मैंने अपने भीतर का रावण देखा है

आँखों में दो अश्रु लिए, कहती हो तुम आज प्रिये,
मेरे अंतर्मन में तुमने, इक छोटा बालक देखा है |
मुरझाऊँ अपने मन में ही, ऊपर से हाँ कह कर भी,
जाने कब से मैंने अपने, भीतर का रावण देखा है |
निरंकुश निठुर अत्याचारी है, दुष्ट महा-अहंकारी है,
सभ्यता, भावना और मनुज से उसे खेलते देखा है |
झूठ कहे वो हसकर के, तोड़े दिल वादे कर कर के,
बिना शिकन जाने कितनो के, स्वप्न रौंदते देखा है |
मन मेरा अब है व्याकुल, हूँ तुमसे मिलने को आतुर,
पर देखूं जब तेरी आँखे, अपनी सी लगती हैं साँसे,
पग बढ़ते ना फिर द्वार तेरे, आना तुम ना पास मेरे,
कैसे दूं तुमको उन हाथो में, जिन्हें सांस घोटते देखा है |
अनजान नहीं हूँ अभी यहाँ, इक सोता रावण देखा है,
जाने कब से मैंने भीतर का, वो पापी रावण देखा है |
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22 thoughts on “मैंने अपने भीतर का रावण देखा है

  1. yaar tum to saare hi kavi nikle…:)..nyways quite impressive…not only the poem bt also the practical demo of the fact that still the literature is thought to be the best medium for expresing oneself…gr8 going guys….

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  2. AnatarDwand ke baawjood apni chahat hi bhalayi oopar aayi hai.. is raavan se, bheetar ka raam abhi bhi kuch bada hai !! 🙂

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  3. This is excellent! It won’t be an exaggeration to say that this rivals that ‘Swades’ song. Khair ham thehre kavita ke keede toh kuchh kahe bina nahi maanenge:

    रावण को पहचान भीतर के राम की छवि निखरती है
    भीतर ही भीतर तो सीता भी रावण पर मरती है

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